पुरानी पेंशन योजना यानी ओल्ड पेंशन स्कीम (OPS) भारत में सरकारी कर्मचारियों के बीच एक लंबे समय से चर्चा का विषय रही है। कई राज्यों में इसे फिर से लागू किया जा चुका है, जबकि केंद्र सरकार ने इसके विकल्प के रूप में एक नई योजना प्रस्तुत की है। मार्च 31, 2026 तक, यह मुद्दा राजनीतिक और वित्तीय दृष्टि से हॉट टॉपिक बना हुआ है, जिसमें केंद्र और राज्य सरकारें अपनी-अपनी रणनीतियों के साथ आगे बढ़ रही हैं।
केंद्र सरकार की नई पहल: यूनिफाइड पेंशन स्कीम (UPS)
केंद्र सरकार ने पुरानी पेंशन योजना को फिर से लागू करने का कोई संकेत नहीं दिया है। इसके बजाय, केंद्र ने यूनिफाइड पेंशन स्कीम (UPS) की शुरुआत की है। UPS को राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (NPS) और OPS दोनों की विशेषताओं को मिलाकर तैयार किया गया है। UPS के तहत 25 वर्ष की सेवा पूरी करने पर लगभग 50 प्रतिशत सुनिश्चित पेंशन देने का प्रावधान रखा गया है। यह योजना NPS की तुलना में अधिक स्थिर और आर्थिक रूप से टिकाऊ मानी जा रही है। इसमें कर्मचारी के लिए नियमित अंशदान की व्यवस्था भी बनी रहती है, जो मासिक आय पर प्रभाव डालता है।
राज्य स्तर पर OPS की वापसी
केंद्र सरकार भले ही OPS को वापस लाने से दूर हो गई हो, लेकिन कुछ राज्यों ने इसे अपने कर्मचारियों के लिए फिर से लागू कर दिया है। राजस्थान, पंजाब, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश और झारखंड जैसे राज्यों में पुरानी पेंशन व्यवस्था बहाल हो चुकी है। यहां तक कि इन राज्यों ने NPS के तहत जमा हुए अंशदान को ब्याज सहित वापस करने का कार्य भी शुरू कर दिया है। इसका मतलब यह है कि इन राज्यों में अब कर्मचारियों को उनके अंतिम वेतन का 50 प्रतिशत सुनिश्चित पेंशन मिलेगा। हालांकि मार्च 31, 2026 तक देशभर में OPS की सार्वभौमिक बहाली नहीं हुई है।
क्यों आकर्षित करती है OPS?
पुरानी पेंशन योजना की लोकप्रियता कई कारणों से बरकरार है। इसमें कर्मचारी के अंतिम वेतन का 50 प्रतिशत बिना किसी अंशदान के मिलता है, जिससे मासिक वेतन में कोई कटौती नहीं होती। महंगाई राहत (Dearness Relief) साल में दो बार स्वतः बढ़ाई जाती है, जिससे क्रय शक्ति बनी रहती है। इसके अलावा पारिवारिक सुरक्षा के लिए कर्मचारी की मृत्यु के बाद परिवार को भी पेंशन मिलती रहती है। दूसरी ओर NPS की राशि बाजार आधारित होती हैं, जो उतार-चढ़ाव पर निर्भर करती हैं, जबकि OPS इस मामले में पूरी तरह सुनिश्चित होती हैं।
आर्थिक दृष्टिकोण और सरकारी चुनौतियां
OPS को वापस लाना केंद्र सरकार के लिए आसान नहीं रहा क्योंकि इससे वित्तीय भार बढ़ने का खतरा रहता है। केंद्र सरकार का पेंशन खर्च 1990-91 में केवल 2,138 करोड़ रुपये था, जो अब बढ़कर मार्च 31, 2026 तक लगभग 1.90 लाख करोड़ रुपये हो चुका है। विशेषज्ञों के मुताबिक़ सरकारी खजाने पर इसका भारी बोझ पड़ सकता हैं क्योंकि यह एक unfunded liability कहलाता हैं — यानी बिना किसी पूर्व-निर्मित कोष के भविष्य में भुगतान करने की जिम्मेदारी लेना।
कर्मचारियों का अगला कदम
मार्च 31, 2026 तक सोशल मीडिया पर OPS संबंधित कई अफवाहों और गलत सूचनाओं का प्रसार हुआ हैं। ऐसे में कर्मचारियों को सही जानकारी हासिल करना बेहद जरूरी हो जाता हैं ताकि वे अपने भविष्य संबंधी फैसले सोच-समझकर ले सकें। उन्हें अपनी आवश्यकताओं और वित्तीय स्थिति को ध्यान में रखते हुए उचित योजना चुननी चाहिए।
Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारी सार्वजनिक स्रोतों पर आधारित हैं और इसका उद्देश्य केवल जागरूकता बढ़ाना हैं। कृपया कोई भी निर्णय लेते समय विशेषज्ञ सलाह लें या संबंधित सरकारी दस्तावेजों का अध्ययन करें।








